टीपू सुल्तान भारत के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी

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टीपू सुल्तान

टीपू सुल्तान एक कुशल प्रशासक एवं योग्य सेनापति था| उसने ” आधुनिक कैलेंडर” की शुरुआत की| उसने अपने आपको ” नागरिक टीपू” कहलवाया| उसने अंग्रेजों के विस्तारवाद का विरोध करके पूरे देश में इस बात का मंत्र फूंका की स्वतंत्रता सबको प्यारी होती है| उसे अंग्रेजों के विरुद्ध बिगुल बजाने वाला प्रथम योद्धा कहा जाता है; जिसने अपने प्राण दे दिए मगर अंग्रेजों के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया|
अंग्रेजों की फिरंगी चाल तथा देश पर अपना वर्चस्व लुटा देने वाला जांबाज योद्धाओं में टीपू सुल्तान का जीवन अनुकरणीय है| टीपू सुल्तान अंग्रेजों की रूह फना कर देने वाला भारत माता का ऐसा सपूत था जिसकी तलवार में बिजली, आवाज में धन गर्जन और इरादों में फौलाद था| उसने अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता को ही अपने जीवन का लक्ष्य माना तथा अपने जीते जी मैसूर की धरती पर अंग्रेजों का झंडा नहीं फहराने दिया|
जिस तरह वीरांगना लक्ष्मीबाई ने 1857 में देश की अस्मिता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी ठीक उसी प्रकार 1799 ईस्वी में टीपू सुल्तान ने देश के लिए खुद को कुर्बान कर दिया|
टीपू सुल्तान के पिता का नाम हैदर अली था| वह मैसूर का सुल्तान था| हैदर अली अपनी रियाया का बेहद प्यारा शासक था| इंसाफ पसंद, अमन पसंद, हैदर अली जितना नरम दिल था, उतना ही कठोर हृदई भी था| उसकी यह कठोरता देश के गद्दारों, अमन में खलल डालने वाले अपराधियों के लिए थी| भारत माता के दुश्मनों तथा देश के गद्दारों के लिए वह काल के समान था|
7 दिसंबर 1782 को युद्ध में हुए घाव के कारण उसकी मृत्यु हो गई| उसके पश्चात उसका पुत्र टीपू सुल्तान मैसूर की राजगद्दी पर बैठा| वह अपने पिता के समान ही बहादुर तथा पराक्रमी था| पिता की मृत्यु के बाद सुल्तान का पद संभालने की टीपू सुल्तान की इच्छा नहीं थी, किंतु राजकीय दीवान जी द्वारा ऊंच-नीच की बात मैं आज रियाया के प्रति उसके कर्तव्य की दुहाई देने पर टीपू, सुल्तान बनने को राजी हो गए|
इस अवसर पर टीपू सुल्तान को अपने भाई करीम शाह की बहुत याद आई| वह सोच रहा था- अगर इस मौके पर करीम सा यहां होता तो मैं उसे मैसूर के तख्त पर बिठाकर स्वयं मैसूर की हिफाज़त करता| इधर टीपू करीम शाह को जिस आत्मीयता से याद कर रहा था उधर करीम शाह अपने शिविर में हैदराबाद के सेनापति के साथ बैठा हुआ शराब के प्याले खाली करते हुए पिता की मृत्यु का जश्न मनाता वह कह रहा था-
” तुबहरजंग साहब! आज मैं बहुत खुश हूं| आज मेरे रास्ते का एक कांटा साफ हो गया| मेरे पिताजी जीते जी कभी भी अंग्रेजों की दोस्ती कबूल नहीं करते| अब तो बस टीपू रह गया है| इस का भी सफाया हो जाए तो……|
” इंशा अल्लाह, उसका सफाया भी जल्द ही हो जाएगा करीम शाह साहब”| कह कर तुबहरजंग ने गिलास खाली भर दिया| तुबहरजंग इसलिए खुश हो रहा था क्योंकि उसका संबंध हैदराबाद से था| वह हैदराबाद का वफादार था| अंग्रेजों से युद्ध न करके सुविधाओं और हुकूमत बचाए रखने के लालच में, उसने अंग्रेजों से दोस्ती कर ली थी, अंग्रेजों के सामने घुटने टेक दिए थे| टीपू सुल्तान के मामले में वह अंग्रेजों का साथ दे रहा था| टीपू के भाई करीम शाह को फुसलाया जा रहा था कि टीपू की जगह वह उसे मैसूर का सुल्तान अंग्रेजों कि मदद से बनवा देगा|
अभी उनके बीच या खिचड़ी पक रही थी तभी एक जासूस अंदर आकर बोला-” हुजूर के लिए एक खास खबर है”|
” कहो”
” मैं सीधे महल से आ रहा हूं| बड़े ही गुपचुप तरीके से टीपू को सुल्तान बना दिया गया है”|
यह खबर सुनकर करीम शाह चौक गया| फिर उसके चेहरे पर तेजी से सदमे के भाव बढ़े और शिकायती नजरों से वह तुबहरजंग का चेहरा देखने लगा|
” हैदर अली के समान वह भी मरने के लिए सुल्तान बन रहा है| मैसूर का असली सुल्तान तो हमारे सामने बैठा है” तुबहरजंग ने कहा|
मगर ना जाने क्यों, यह सुनकर भी करीम सा को कोई खास खुशी नहीं हुई|
टीपू सुल्तान की ताजपोशी की खबर सुनकर अंग्रेजों और हैदराबाद के निजाम ने उसके पास एक सुलहनामा भेजा| उनके सोच के अनुसार पिता की मृत्यु से शायद टीपू अंग्रेजों की दोस्ती को राजी हो जाता|
इसके साथ ही उन्होंने उसके भाई करीम शाह से भी वादा किया कि वे उसे राजगद्दी पर अवश्य बिठाएंगे| इसके लिए चाहे उन्हें मैसूर के टुकड़े ही क्यों ना करना पड़े| उनके इस आश्वासन पर करीम शाह संतुष्ट था|
टीपू के दरबार में जब हैदराबाद के निजाम का दूत, अंग्रेजों से दोस्ती का पैगाम लेकर आया तो टीपू ने कहा-” निजाम से कह देना कि मुझे उसकी हमदर्दी नहीं चाहिए| अब उसका तथा हमारा फैसला तो मैदान-ए-जंग में ही होगा”|
दूत के जाने के पश्चात टीपू को अपने भाई करीम शाह की नादानी पर बड़ा गुस्सा आया, जो की लालच में अंधा होकर अपने स्वर्गवासी पिता तथा भाई से गद्दारी कर बैठा था|
दूत ने जब टीपू का संदेश, अंग्रेजों और हैदराबाद के नवाब को दिया तो करीम शाह ने राहत की सांस ली| करीम शाह को विश्वास हो गया था कि वह दिन दूर नहीं जब वह मैसूर के तख्त पर बैठा होगा| टीपू के इनकार का मतलब है जंग| जंग हुई तो टीपू का मारा जाना लाजमी है|
पर टीपू फौलादी इरादों वाला शासक था| अंग्रेज ब्रिगेडियर नेट टीपू के विरोध 1783 में युद्ध छेड़ा तो अंग्रेजों की हार हुई और ब्रिगेडियर अपने सैनिकों सहित कैद कर लिया गया|
तब अंग्रेजों ने 1784 में टीपू से संधि की| संधि के अनुसार एक दूसरे के जीते हुए प्रदेश वापस कर दिए गए|
1785 से 1787 तक अंग्रेजों और टीपू के बीच युद्ध हुआ| इस युद्ध में भी टीपू जीत गया| उसके बाद अंग्रेजों ने निज़ाम और मराठों को साथ लेकर 1791 में पुनः युद्ध की तैयारी कर ली|
एक बार फिर मैसूर के किले पर हमला बोल दिया गया| एक तरफ अंग्रेजों की फौज थी तो दूसरी तरफ निजाम की फौज| इस बार अंग्रेजों का नेतृत्व लार्ड कार्नवालिस कर रहा था| वह जल्द से जल्द मैसूर को जीत लेना चाहता था| तो पर आग उगलने लगी थी| मैसूर की रियाया में हाहाकार मच गया| करीम शाह ने अपने भाई से गद्दारी करते हुए मैसूर के किले में प्रवेश करने के सभी गुप्त रास्ते की जानकारी, हैदराबाद के निजाम को दे दी| इसके आधार पर उसकी तथा अंग्रेजों की फौज बड़ी आसानी से किले में प्रवेश कर गई|
जब तक टीपू की फौजी मैदान में आ पाती, तब तक फिरंगियों की सेना शहर में दाखिल होकर शीश महल के करीब पहुंच चुकी थी| उन्होंने महल पर खड़े सिपाहियों पर गोलियां बरसाना शुरू कर दी| तब टीपू ने अपनी सेना को तीन हिस्सों में बाटा- एक का सेनापति वह खुद था| दूसरे दल का सेनापति कमरुद्दीन तथा तीसरे दल का मुखिया दीवान जी थे|
फौज के मैदान में आते ही घमासान लड़ाई होने लगी| चारों ओर हाहाकार मच गया| अंग्रेज जनरल अपने सैनिकों को जोश दिलाने के लिए ललकार रहा था| सुबह सूरज निकलते ही युद्ध आरंभ हो गया| दोपहर तक युद्ध आंधी तथा तूफान की तरह होता रहा| लाशें की ढेर लग गए|
युद्ध में मैसूर की सेना आधी से ज्यादा वीरगति को प्राप्त हो गई| दीवान का साहस जवाब देने लगा| उसने दूर तक निगाह दौराई, लेकिन युद्धभूमि से उसे टीपू कहीं नजर नहीं आया|
उस दिन किसी तरह सूरज डूबा| दोनों और की सेनाएं पीछे लौटने लगी| उस दिन की लड़ाई में मैसूर की हजारों सैनिक मारे गए, कुछ घायल भी हुए| कुल एक-चौथाई सैनिक ही बचे थे जो दोबारा युद्ध के काबिल थे|
उधार, अंग्रेज जनरल के कैंप में निजाम उस से हाथ मिला रहा था दोनों को जीत की खुशी थी|
इधर रात के समय टीपू अपनी छावनी में पहुंचा| वह वहां पर बचे-खुचे सैनिकों को जोशीला भाषण देने लगा| उसके सैनिकों में जान आ गई| एक स्वर में जोर से चिल्ला उठे-” सुल्तान, हम वतन के लिए कुर्बान हो जाएंगे| हम सब ने सिर पर कफन बांध लिया है| आप हमें दुआ दीजिए”|
टीपू संतुष्ट हो गया, उसका सीना चौड़ा हो गया|
सवेरा होते ही दोनों ओर से फिर भयंकर लड़ाई छिड़ गई| मैसूर के सिपाही उस दिन पूरी ताकत से लड़ रहे थे| वह सिर पर कफन बांध कर निकले थे वे फिरंगियों कि लाश ज़मीन पर बिछा रहे थे|
सच है, जिसने सिर पर कफन बांध लिया हो, जिसे दिन दुनिया से मोह न रह और जो आलिंगन करने के लिए मौत को ढूंढता फिर रहा हो, उससे भला कौन जीत सकता है| निजाम के सिपाही मैसूर के योद्धाओं की मार से बुरी तरह घबरा गए|
ऐसे में करीम साह टीपू आमने सामने आए| करीम को देख टीपू की नसें फटने लगी| उसने पिता की दुहाई देकर करीम को गद्दारी के लिए धिक्कारा| करीम को लगा की उसका पिता हैदर अली उसे दिखा रहा है|

उसने पिता की दुहाई देकर करीम को गद्दारी के लिए धिक्कारा। करीम को लगा कि स्वयं उसका पिता हैदर अली उसे धिक्कार रहा हो। उसको बहुत आत्मग्लानि हुई। उसके हाथ से तलवार जमीन पर गिर गई। वह घोड़े से कूदा और जाकर बड़े भाई के पैर पकड़ लिए। वह कदमबोसी करने तथा रोने लगा।
टीपू ने भाई के आंसू पूछ तथा उसे सीने से लगा लिया। फिर करीम शाह ने उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर फिरंगियों से युद्ध करने का वादा किया।
अंग्रेज जनरल ने जब करीम को अपने खिलाफ देखा तो वह उसे बुरा-भला कहने लगा। पर करीम शाह की अब आंखें खुल चुकी थी। उसने वीरता के साथ युद्ध करते हुए तूब्हरजंग को मार डाला। तूबहरजंग के मरते ही निजाम की सेना मे खलबली मच गई। निजाम गुस्से से कांपने लगा। वह जोश में भरा हुआ करीम के सामने आया। दोनों में तलवारों का भयंकर युद्ध होने लगा। दोनों एक दूसरे के खून के प्यासे थे। तकरीबन एक पहऱ तक निजाम और करीम की तलवारे आपस में बजती रहे। आखिर में शाम हो गई। लड़ाई बंद हो गई। मगर दोनों में से किसी की भी हसरत पूरी नहीं हो सकी। वे एक दूसरे को प्राप्त नहीं कर सके।
अगले दिन युद्ध फिर शुरू हुआ। गोरो की फौज ने जब देखा की वे तलवार से युद्ध नहीं जीत सकते तो गोलीबारी करने लगे। गोलीबारी में मैसूर फौज में भगदड़ मच गई। sainik कटे पेड़ की तरह धरती पर गिरने लगे। चारों ओर हाहाकार मच गया। इसी प्रकार शाम हो गई।
रात को जब मैसूर की फौज किले की छावनी में पहुंची तो टीपू को यह देखकर बेहद अफसोस हुआ की उनके सैनिक की मात्रा बहुत ही कम रह गई थी।
टीपू महल में आ गया। उसकी पत्नी रुनिया बेगम युद्ध का सारा हाल सुन चुकी थी। वह अपने पति को दिलासा देने लगी।
सभी हालतों पर गौर करने के पश्चात उसे लगने लगा की उसे गोरो के साथ सुला कर लेनी चाहिए।
उसने यह बात रुनिया बेगम, करीम शाह, दीवान जी, कमरुद्दीन सभी को बता दी। सभी ने टीपू को समझाना चाहा किंतु उसने संधि का फैसला कर लिया था।
किंतु,अंग्रेज जनरल ने दगाबाजी की और संधि के बावजूद मैसूर पर फिर से हमला बोल दिया। यह हमला 4 मई 1799 को यह बहाना करके किया गया कि टीपू ने फ्रांसीसियों को अपने यहां बुला कर षड्यंत्र किया है। इस हमले ने टीपू को बहुत आहत किया। उसके दोनों पुत्र भी दुश्मनों के हाथों चले गए थे। अब टीपू के पास जंग के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था।
टीपू की सेना आंधी की तरह मैदान में आ गई और जान हथेली पर रखकर अंग्रेजो के साथ युद्ध करने लगी।
हिंदू सिपाहियों के मुंह से हर हर महादेव का उदघोषण सुनाई दे रहा था और मुसलमान सिपाही अल्लाह हो अकबर के नारे लगा रहे थे।
फिरंगियों की टोपी में लगातार गोले बरसा रहे थे। घमासान लड़ाई हो रही थी तथा साफ साफ दिखाई दे रहा था कि अंग्रेज तथा निज़ाम की फौज मैसूर सेना पर हावी होती जा रही है। बराबर की जंग में तो इससे दुगुनी अंग्रेज आज भी आगे नहीं बढ़ पाती किंतु वहां तो बेइंसाफी थी। एक फौज के पास केवल तीन और तलवारें थी जबकि दूसरी फौज के पास बड़ी बड़ी मशीनी आग उगलने वाली तोपे थी।
फिरंगी सिपाहियों ने चारों ओर से टीपू सुल्तान को घेर लिया। टीपू की आंखों में खून उतर आया। उसने बात ही बात में सबका सफाया कर दिया। अपने आदमियों को न्यू गाजर मूली के समान कटते देख अंग्रेज जनरल आग बबूला हो गया। वह फौरन टीपू की ओर झपटा। उसने टीपू पर तलवार का भरपूर वार किया और एक दम से टीपू के सामने आ गया।
फिर तो कई गोरे सिपाही टीपू पर टूट पड़े। किंतु टीपू तनिक भी विचलित नहीं हुआ। उसने देखते ही देखते सबको धराशाही कर दिया।
पर उस वीर रणबांकुरे पर एक गोरे ने गोली चला दी। वह बुरी तरह घायल हो और चीख मारकर घोड़े से गिर गया। टीपू को ले जाकर शिविर में लिटाया गया। उसका अंतिम समय आ गया था। टीपू ने अपने भाई करीम को अपने पास बुलाया। करीम लहराकर भाई की दे पर गिर पड़ा। दोनो भाई एक दूसरे से गले मिले और टीपू के प्राण निकल गए। इसी के साथ करीम के भी प्राणों का अंत हो गया क्योंकि वह भी युद्ध में बुरी तरह घायल हो गया था। यह 4 मई 1799 की घटना है।
अंग्रेजी सेना ने टीपू की मृत्यु के पश्चात उसकी राजधानी श्रीरंगपट्टनम, उसके राजमहल तथा पूरे नगर की निर्दयता से लूटपाट की। उसके परिवारी सदस्यों को वेल्लोर में कैद कर लिया। अंग्रेजों ने कन्नड़, कोयंबटूर, बेनड़, धारपुरम और मैसूर का समस्त समुद्री तट अपने प्रदेश में विलय कर लिया। कुछ प्रदेश निजाम को भी दे दिए। वाडियार वंश का एक बालक मैसूर का राजा बना दिया गया, जो कि अंग्रेजों की हाथ की कठपुतली था। देश पर सहायक संधि को ठोक दिया गया। टॉमस मुनरो ने टीपू के विषय में लिखा है- नवीनता की अविभ्रांत भावना तथा प्रत्येक वस्तु के स्वयं ही प्रसूत होने की रक्षा उसके चरित्र की मुख्य विशेषता थी।
यह था अंग्रेजों के विस्तारवादी नीति के विरुद्ध बिगुल फूंकने वाला प्रथम योद्धा जिसने वीरता के साथ अंग्रेजों से युद्ध कर उसके दांत खट्टे कर दिए।

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